Tuesday, April 23, 2019

भारत को ईरान से तेल मिलना बंद हो गया तो..

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान से तेल ख़रीदने पर भारत समेत आठ देशों को दी गई छूट आगे न बढ़ाने का फैसला किया है.

अमरीका ने 180 दिनों की ये छूट भारत, चीन, इटली, ग्रीस, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और तुर्की को दी थी लेकिन इसकी समय सीमा 2 मई को ख़त्म हो रही है.

ईरान से सबसे ज़्यादा तेल ख़रीदने वालों में चीन के बाद भारत दूसरे नंबर पर है.

अमरीका की इस पाबंदी का भारत के बाज़ार पर क्या असर होगा, इसे लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं.

सोमवार को यह ख़बर आते ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें 3.33 फीसदी बढ़ गईं.

साथ ही भारत में शेयर बाज़ार के दोनों सूचकांक सेंसेक्स और निफ़्टी में साल की सबसे बड़ी गिरावट देखी गई.

कच्चे तेल की कीमतें बीते छह महीनों के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गईं और सेंसेक्स 495 अंक गिर गया.

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है, "सरकार ने अमरीकी सरकार के इस फ़ैसले को देखा है. हम इस फ़ैसले के असर से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय इस बारे में पहले ही एक बयान जारी कर चुका है. सरकार अपने ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा से जुड़े हितों की रक्षा के लिए अमरीका समेत अपने सहयोगी देशों के साथ काम करती रहेगी."

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी ट्विटर पर लिखा है कि सरकार भारतीय रिफ़ाइनरीज़ को कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अपनी योजना के साथ तैयार है. साथ ही दूसरे तेल उत्पादक देशों से भी बड़े स्तर पर आपूर्ति की जाएगी ताकि पेट्रोलियम पदार्थों की मांग को पूरा किया जा सके.

लेकिन क्या यह समस्या सिर्फ़ तेल उत्पादों की आपूर्ति तक ही सीमित है?

हमने ऑब्ज़र्वर रिज़र्व फाउंडेशन के चेयरमैन संजय जोशी से बात की, जो मानते हैं कि भारत किसी तरह तेल की आपूर्ति तो कर लेगा, लेकिन महंगाई बढ़ने का संकट ज़रूर हो सकता है.

संजय जोशी के मुताबिक, "ईरान से आने वाले तेल में कमी तो ज़रूर आएगी, लेकिन तेल की आपूर्ति कहीं से भी हो सकती है. ऐसा नहीं है कि तेल की कमी होने वाली है, बल्कि तेल की कीमतें बढ़ेंगी और रुपये की क़ीमत घटेगी. एक बड़े देश का प्रोडक्शन बाज़ार से बाहर हो जाता है तो उसकी कीमतें बढ़ जाती हैं. अगर वो प्रोडक्शन दूसरी जगहों से पूरा हो सकता है, मसलन अगर सऊदी अरब अपना प्रोडक्शन बढ़ा दे- तो कीमतें फिर कम हो जाएंगी."

संजय जोशी मानते हैं कि इसका भारत-ईरान व्यापारिक संबंधों पर कोई बड़ा असर नहीं होगा.

वह कहते हैं, "भारत का शुरू से यही मानना रहा है कि अमरीका की पाबंदियां एकतरफ़ा हैं और उन्हें संयुक्त राष्ट्र की मंज़ूरी नहीं है. जहां तक ईरान से व्यापार का सवाल है, जहां तक व्यापार संभव है, भारत करता रहेगा."

अमरीकी फ़ैसले के बाद ईरान को धन के भुगतान में दिक्कतें आएंगी क्योंकि बैंकिंग सिस्टम पर अमरीका का नियंत्रण है. दोनों देश व्यापार का कुछ हिस्सा रुपयों में डील करते हैं लेकिन ज़्यादातर व्यापार डॉलर में ही होता है. अर्थशास्त्र का सामान्य नियम यही कहता है कि दोनों देश अपना पूरा कारोबार रुपये में तभी कर सकते हैं, जब दोनों के बीच व्यापार-संतुलन हो. यानी जितना माल भारत आता हो, उतनी ही कीमत का ईरान को जाता हो. लेकिन ऐसा नहीं है.

वह कहते हैं, "ईरान भारत के लिए भू-राजनीतिक महत्व का देश है. इसलिए भारत के लिए ईरान से संबंध बनाए रखना ज़रूरी है और भारत बनाए रखेगा. तेल की इसमें एक छोटी सी भूमिका है. सब जानते हैं कि भारत ने वहां काफ़ी निवेश किया है. चीन के सीपेक के काउंटर के तौर पर भारत ने वहां चाबहार पोर्ट को विकसित किया है. इसलिए ईरान और भारत के बीच संबंधों में खटास आना तो संभव ही नहीं है. इसलिए व्यापार होता रहेगा, उसमें कुछ मुश्किलें ज़रूर आएंगी."

संजय जोशी कहते हैं कि अमरीका के ताज़ा फ़ैसले के बाद अगर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आता है, जो कि आया है, तो इसका असर बिल्कुल पड़ेगा.

उनके मुताबिक, "सबसे पहले रुपये की क़ीमत गिरेगी. उसका प्रभाव तुरंत दिखता है. जैसे जैसे तेल की क़ीमत गिरती है, वैसे ही राजकोषीय घाटा बढ़ता है. रुपये की क़ीमत जब डॉलर के मुक़ाबले एक रुपये बढ़ती है तो भारत का राजकोषीय घाटा सीधे 800 करोड़ रुपये बढ़ जाता है."

इस फ़ैसले से आठ देश प्रभावित होंगे जिनमें जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अमरीका के मित्र देश भी शामिल हैं.

अमरीकी विदेश मंत्रालय की बीबीसी संवाददाता बारबरा प्लेट यूशर के मुताबिक, बीते कुछ हफ़्तों में जापान और दक्षिण कोरिया ने ईरान से तेल आयात को या तो रोक दिया है, या बिल्कुल कम कर दिया है. लेकिन अमरीकी सरकार के ताज़ा फ़ैसले का असर देशों के संबंधों पर पड़ सकता.

बारबरा के मुताबिक, "भारत के लिए तो यह और भी बड़ी समस्या है क्योंकि अमरीका उस पर वेनेज़ुएला से भी अपना तेल आयात घटाने का दबाव बना रहा है. लेकिन भारत के ईरान से गहरे सांस्कृतिक-राजनीतिक रिश्ते हैं इसलिए उसके लिए ईरान को घेरने की अमरीकी मुहिम में शामिल होना मुश्किल होगा. "

मूल समस्या भुगतान की है क्योंकि बैंकिंग प्रणाली पर अमरीका का नियंत्रण है. संजय जोशी याद दिलाते हैं कि इससे निपटने के लिए यूरोपीय संघ ने एक नई संस्था बनाई थी 'इनस्टेक्स' नाम से जिसके तहत यूरोप और ईरान सीधे वित्तीय लेनदेन पर निर्भरता के बिना कारोबार कर सकते थे.

ऐसे ही प्रयास कुछ मायनों में चीन ने भी किए हैं. चीन युआन में कारोबार करता है और कुछ हद तक भारत भी रुपये में व्यापार कर रहा है. लेकिन उसकी सीमाएं हैं.

सभी बैंकिंग चैनल्स पर डॉलर का प्रभुत्व है और इसे तोड़ने की कोशिशें हो रही हैं.

लेकिन भारत सरकार की मुश्किल ये है कि उसे इस मुश्किल से उस समय निपटना है जब भारत में चुनाव हो रहे हैं.

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