Tuesday, July 30, 2019

नए पार्टनर में आप अपने एक्स को क्यों तलाशते हैं?

आपने ब्रेकअप के बाद अक्सर लोगों को ये कहते सुना होगा कि वो मेरे टाइप की नहीं थी या नहीं था.

उसका और मेरा मिज़ाज नहीं मिलता था. या फिर किसी के साथ एक-दो डेट पर जाने के बाद ही लोग कहने लगते हैं कि वो मेरे जैसा/जैसी नहीं है.

रिश्तों के इस नए दौर में 'मेरे टाइप के' साथी की तलाश अंतहीन है. पर, क्या किसी ने भी ये जानने की कोशिश की है कि दुनिया में 'मेरे टाइप के' के जैसी कोई चीज़ है भी या नहीं?

हालिया रिसर्च से ये बात तो सामने आई है कि हम उम्र का फ़ासला शिक्षा, बालों के रंग और लंबाई को देख कर अपने साथी चुनते हैं. लेकिन, इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि लोग अपने मिज़ाज के हिसाब से ख़ास तरह का पार्टनर तलाशते हैं.

लेकिन, पिछले दिनों एक रिसर्च के नतीजे सामने आए हैं, जिससे ये पता चलता है कि अगर आप अपने टाइप के पार्टनर को खोज रहे हैं, तो आपको आईने में देखने की ज़रूरत है.

ये रिसर्च, जर्मनी में 12 हज़ार से ज़्यादा लोगों पर क़रीब 9 साल तक की गई थी. इस में वही लोग शामिल किए गए थे, जो खुले मिज़ाज के थे. जो नए तजुर्बे करने के लिए राज़ी थे. जो आसानी से किसी से सहमत हो जाते थे और ईमानदार थे.

रिसर्च टीम ने इन लोगों के रोमांटिक संबंधों पर पूरे नौ बरस तक नज़र रखी. इन लोगों से ये भी कहा गया था कि वो अपने पार्टनर को भी इस रिसर्च का हिस्सा बनने के लिए राज़ी करें.

9 साल बाद इस रिसर्च में केवल 332 लोग ऐसे बचे थे, जो कम से कम दो रूमानी रिश्तों में जुड़े. इतने बड़े सर्वे में केवल 332 लोगों का एक से ज़्यादा रोमांटिक रिलेशनशिप में रहना चौंकाने वाली बात थी. लेकिन, इससे रिसर्च एक नतीजे पर पहुंच सके, इन 332 लोगों ने अपने मौजूदा साथियों की वही ख़ूबियां बताईं, जो उनके पुराने पार्टनर में थीं.

इसका मतलब ये हुआ कि रिसर्च में शामिल लोग भले ही ये मान रहे थे कि अपने साथी को लेकर उनकी अपेक्षाएं बदल गईं. लेकिन, हक़ीक़त ये थी कि वो अपने पार्टनर में कुछ ख़ास गुण तलाश रहे थे और वो गुण उन्हें पहले पार्टनर में भी मिला और दूसरे में भी. तभी वो उनसे जुड़ सके.

अब आप ये बात मानें या न मानें, अगर आप किसी साथी को तलाश रहे हैं, तो हो सकता है कि जिसकी तलाश हो उसमें आप अपने एक्स यानी पुराने पार्टनर जैसे गुण ही खोजते हैं और मिलने पर उसके साथ आसानी से जुड़ जाते हैं.

मज़े की बात ये है कि जर्मनी में जो रिसर्च हुई, उसमें न केवल साथियों के गुण एक जैसे थे, बल्कि कइयों के तो पार्टनर भी वही थे, यानी पुराने वाले.

अपने रोमांटिक साथी में अपने जैसे गुण तलाशना कोई ग़ैर मामूली बात नहीं है. हम सब अपने आस-पास के ऐसे ही लोगों से जुड़ते हैं, जिनसे हमारे विचार और आदतें मेल खाती हैं. ऐसे रिश्तों में आप को अपने ख़यालात और आदतें नहीं बदलनी होतीं.

हां, कुछ लोग जीवन में नए-नए प्रयोग करने के लिए अलग-अलग साथियों के साथ वक़्त बिताकर उन्हें आज़माते हैं. रिसर्च से ये भी पता चला कि बहिर्मुखी लोगों के अपने जैसी ख़ूबियों वाले साथी से रूमानी रिश्ते बनाने की संभावना बहुत कम ही होती है.

तो, अगर हमारे रिश्ते हमारी सोच के समर्थक लोगों से बनते हैं. पर, अगर हम खुले ज़हन के हैं, तो हम जीवन में नए तरह के साथी के साथ भी तजुर्बे कर सकेंगे, ताकि दुनिया को देखने का एक नया नज़रिया हमें मिले.

इस रिसर्च से ऑनलाइन डेटिंग के लिए भी नई उम्मीदें जगी हैं. जैसे संगीत सुनाने वाले ऐप आप की पसंद के हिसाब से गाने सुझाते हैं. वैसे ही, डेटिंग ऐप भी आप को आप के मिज़ाज के हिसाब से ही ऐसे लोगों से जुड़ने का सुझाव देंगे, जिनका व्यवहार आप से मिलता हो.

अब रिसर्च से हमें ये तो पता नहीं चला कि ऐसे रिश्ते कितने समय तक चले. इसलिए, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि कोई रिश्ता कितने दिन तक चलने वाला है.

अपने पार्टनर के साथ बहुत ज़्यादा समानता आपके विकास में बाधक बन सकती है. अगर, आप से जुड़ने से पहले आपके पार्टनर का कोई पुराना रिश्ता रहा है, तो वो आप के लिए मुसीबत भी बन सकता है. क्योंकि नए साथी के गुण उसके पुराने पार्टनर से मिलते होंगे, तो आप के लिए ये फ़िक्र और नाउम्मीदी की बात है.

इसके विपरीत, अगर आपके मौजूदा साथी का मिज़ाज आपके पुराने पार्टनर से मिलता है, तो उससे मज़बूत रिश्ता क़ायम करना आसान होगा. तो, तलाक़ के बढ़ते मामलों के लिए इस बात को दोष न दें कि लोगों को 'उनके टाइप' का साथी नहीं मिला, इसलिए तलाक़ हो गया.

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